लाल श्याम शाह एक प्रखर आवाज

“लाल श्यामशाह एक प्रखर आवाज “
आदिवासी अधिकारों जल जंगल जमीन की लड़ाई और सामाजिक क्रांति के इतिहास में लाल श्याम शाह का नाम एक अमर अध्याय की तरह दर्ज है। वे केवल एक राजनीतिक प्रतिनिधि या राजा ही नहीं थे बल्कि वे शोषण के विरुद्ध शोषितों की बुलंद हुंकार थे। जिसने भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद के भीतर गुंज कर व्यवस्था को अपनी कर्तव्यों का स्मरण कराया था ।लाल श्याम शाह एक प़खर आवाज शीर्षक से लेख लिखने को मैंने लेखनी उठाई पर उठी की उठी रह गई लेकिन मेरे मन में लिखने की विवसता हुई तो उनके कुछ जीवन के अंश को लिखने का साहसिक प्रयास किया हूं। उनके जीवन उनके संघर्ष उनके सिद्धांतों और उनके उस अदम्य स्वाभिमान का विशद विवेचन है। जिसने आदिवासी चेतना को एक नई दिशा एक नई पहचान दी।
मोहला मानपुर पाना बरस के ऐतिहासिक वनांचल में जन्मे लाल श्याम शाह का जीवन अंतर्विरोधों और अनूठे संकल्पों का अनोखा संगम है। वे एक रियासती पृष्ठभूमि से आते थे वह चाहते तो महलों के ऐसो आराम राजाज्ञा
के सुख और मखमली जिंदगी को चुनकर जन सामान्य की दुर्दशा से मुंह मोड़ सकते थे। किंतु जिसकी धमनियों में अपनी माटी का प्रेम और जन सेवा का रक्त बहता हो उसे महलों की चार दिवारी बंद कर नहीं रख सकती।
लाल श्याम शाह ने बचपन से ही अपने क्षेत्र के आदिवासियों आदिम जनजातियों और क्षेत्र में निवास वरत सभी वर्ग के निर्धन किसानों को देखा था। उन्होंने देखा कि किस तरह सदियों से अपने ही जंगलों में सीना तानकर जीने वाला आदिवासी धीरे-धीरे सो शोषकों ठेकेदारों साहूकारों और नौकरशाही के चंगुल में फंसकर अपनी ही जमीन पर पराया होता जा रहा है यह दृश्य उनके हृदय को व्यथित कर गया। उन्होंने महली सुख सुविधाओं का त्याग किया और स्वयं को पूरी तरह से जनता के दुखों के निवारण में झोंक दिया उनका राजा होना किसी सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि दायित्व कि उस पराकाष्ठा का प्रमाण था जहां राजा प्रजा का स्वामी नहीं बल्कि उसका सबसे बड़ा रक्षक और सेवक होता है।
आजादी के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आगाज हुआ तब लाल श्याम साह ने यह भली भांति समझ लिया था कि आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा केवल पारंपरिक तरीकों से नहीं बल्कि देश के कानून और संविधान के दायरे में रहकर संसद की टेबल पर लड़नी होगी। वह चुनाव मैदान में उतरे और जनता ने अपने इस मसीह को अपार जन समर्थन देकर सांसद लोकसभा भेजे संसद के भीतर लाल श्याम शाह की उपस्थिति किसी साधारण सांसद जैसी नहीं थी। वह अपनी वेशभूषा अपनी सादगी और अपनी खरी-खरी बातों के लिए जाने जाते थे वह जब बोलते थे तो उनके शब्दों में छत्तीसगढ़ के घने जंगलों की सरसराहट बस्तर और मोहला मानपुर की नदियों का प्रवाह और शोषितों की व्यथा साफ सुनाई देती थी।


उनकी आवाज की सबसे बड़ी परीक्षा तब हुई जब देश में आदिवासियों और वनांचल के लोगों की अपेक्षा लगातार बढ़ती जा रही थी वह उस व्यवस्था से बेहद आहत थे जहां योजनाएं तो आदिवासियों के नाम पर बनती थी लेकिन उनका लाभ कभी धरातल पर उन तक नहीं पहुंचता था। संसद के इतिहास में वह स्वर्णिम और अभूतपूर्व क्षण आज भी दर्ज है। जब लाल श्याम शाह ने व्यवस्था के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अपनी लोकसभा सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था उनका त्यागपत्र केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं था बल्कि वह सत्ता की गद्दी पर बैठे कर्णधारों के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा था उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनके लिए सांसद का पद सुविधाएं और भत्ता जनता के अधिकारों से बढ़कर नहीं है ।यदि वे अपनी जनता की आवाज बनकर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करा सकते तो उन्हें उस कुर्सी पर बैठने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
लाल श्याम शाह एक प्रखर आवाज का अर्थ केवल एक व्यक्ति की वाणी नहीं है यह क्षेत्र वासियों के हितों की रक्षा की धारा है।
बाबा लाल श्याम शाह का स्पष्ट मानना था कि जंगल पर पहला अधिकार वहां सदियों से बसने वाले निवासियों का है जंगल केवल लकड़ी या खनिजों का खजाना नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति धर्म और जीवन शैली का आधार है। उन्होंने क्षेत्र वासियों को यह सिखाया कि वे याचक नहीं इस देश के मूल निवासी हैं और उन्हें अपने अधिकारों के लिए सिर उठाकर जीना चाहिए। उनका इस जल जंगल जमीन पर मालिकाना हक है हक था और हक रहेगा।
साहूकारी प्रथा बेगारी और शराब खोरी जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ उन्होंने लगातार अलख जगाई वे जानते थे कि जब तक समाज अंदर से मजबूत नहीं होगा बाहरी शोषकों से नहीं लड़ा जा सकता। उनकी आवाज में ना तो कोई लालच था और ना ही कोई भय वे मंत्रियों और अधिकारियों की आंखों में आंख डालकर सत्य बोलने का साहसिक माद्दा रखते थे। उनकी यही निष्पक्षता और निडरता उन्हें अन्य नेताओं से अलग और महान बनाती है।
सांसद त्याग्नि के बाद लाल श्याम शाह शांत होकर नहीं बैठे। वे पुन अपनी माटी अपने जंगल और अपनी जनता के बीच लौट आए ।उन्होंने मोहला मानपुर अंबागढ़ चौकी महाराष्ट्र बस्तरऔर आसपास के विशाल भूभाग में पैदल यात्राएं की चौपालें लगाई और लोगों को संगठित किया।
उनका जीवन अत्यंत सादा था ।वे आम आदिवासियों की तरह ही रहते थे उन्हीं के साथ भोजन करते थे और उन्हीं की भाषा में उनसे संवाद करते थे जनता के बीच उनकी पैठ इतनी गहरी थी कि लोग उन्हें केवल अपना नेता ही नहीं बल्कि अपना संरक्षक और पिता तुल्य मानते थे जब भी कहीं अन्याय होता लाल शमशाद वहां सबसे पहले पहुंचते थे। चाहे वह वन विभाग की ज्यादती हो पुलिस का अत्याचार हो या फिर ठेकेदारों द्वारा किया जाने वाला शोषण लाल श्याम शाह की एक हुंकार पर हजारों हजार लोग एकत्र हो जाते थे।
आज जब हम 21वीं साड़ी में जी रहे हैं जहां विकास की परिभाषा बड़े-बड़े बांधों खदानों और कंक्रीट के जंगलों से की जा रही है तब लाल श्याम शाह के विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। आज भी वनांचल में जल जंगल जमीन का विस्थापन एक गंभीर मुद्दा है आज भी पर्यावरण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती देश के सामने खड़ी है ऐसे समय में लाल श्याम शाह का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि विकास वही सार्थक है जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में खुशहाली लाए ना कि उसकी पहचान और उसके अस्तित्व को ही मिटा दे।
लाल श्याम साह जी ने जिस आवाज का बीजारोपण किया था वह आज भी छत्तीसगढ़ के जन आंदोलन में गूंजती है। जब भी कोई आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए खड़ा होता है जब भी कोई शोषित अपने हक अधिकार के लिए आवाज उठाता है तो उस आवाज में श्याम शाह के सिद्धांतों की प्रति ध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है।
लाल श्याम शाह केवल एक नाम या इतिहास के पन्नों में दर्द एक व्यक्तित्व नहीं है वह एक सोच है एक विचार हैं और स्वाभिमान का एक कभी न बुझने वाला प्रतीक है उन्होंने पद और प्रतिष्ठा का त्याग करके यह सिद्ध कर दिया कि जन सेवा ही सर्वोपरि धर्म है छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर उनका नाम सदैव एक प्रकाश स्तंभ की तरह चमकता रहेगा उनके जीवन गाथा आने वाली पीढियां को यह सिखाती रहेगी कि सत्य और न्याय अधिकारों की लड़ाई में कभी समझौता नहीं करना चाहिए लाल श्याम शाह की वह आवाज जो कभी संसद की गलियों से लेकर बस्तर और महाराष्ट्र राजनांदगांव तथा देश के विभिन्न कोने-कोने के घने जंगलों तक गूंजी थी। वह आज भी अमर है और सदैव अमर रहेगी वह आज भी अमर है और सदैव अमर रहेगी।
टीप _ मुझे लाल श्यामशाह जी के कृतित्व का तारीख मालूम नहीं है।मेरे जानकारी में जो बातें थीं उसको लिखने का दुस्साहस किया है। निश्चित तौर पर संकलन कर आगे और भी बहुत कुछ लिखूंगा।
आपका अपना लखनलाल लहरिया
योगेन्द्र सिंगने मोहला की रिपोर्ट