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औंधी धान खरीदी केन्द्र की दुर्दशा…

औंधी धान खरीदी केंद्र की दुर्दशा: किसानों की मेहनत पर बदइंतज़ामी का बोझ

औंधी। सरकार किसानों की सुविधा और सम्मान की बात तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। औंधी धान खरीदी केंद्र में इस बार खरीदी की शुरुआत बदइंतज़ामी और लापरवाही के साए में हो रही है। किसानों की महीनों की मेहनत का मूल्य तय करने वाले इस केंद्र में व्यवस्था नाम की कोई चीज़ दिखाई नहीं दे रही।

हमाल नहीं — किसान खुद तौल रहे बोरी

केंद्र में हमालों की नियुक्ति न होने से स्थिति बेहद खराब है। तौल-कांटा और बोरी उठाने-रखने का पूरा भार किसानों पर ही डाल दिया गया है। बुजुर्ग किसान भी अपने बच्चों के साथ मिलकर घंटों बोरी ढोते दिखाई दे रहे हैं। प्रशासन की यह चुप्पी किसानों की मजबूरी पर चोट कर रही है।

बोरी सिलाई की व्यवस्था नहीं, छल्ली नहीं — जगह की भारी कमी

धान खरीदी के लिए बोरी सिलाई की मशीन तक मौजूद नहीं है। किसान खुद किसी तरह बोरी बांधकर व्यवस्था संभालने की कोशिश करते हैं।
छल्ली (धान फैलाने-सुखाने की जगह) न होने से केंद्र पूरी तरह अव्यवस्थित दिख रहा है। जगह की कमी के कारण आने-जाने में भी परेशानी होती है और धान के सुरक्षित रखरखाव पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

पिछले साल का 760 क्विंटल धान अब तक उठावहीन

केंद्र की दुर्दशा का सबसे बड़ा उदाहरण है—पिछले वर्ष का 760 क्विंटल धान, जिसका उठाव आज तक नहीं हुआ है। इतना धान गोदाम में पड़े-पड़े खराब होने की कगार पर है, लेकिन जिम्मेदार विभाग कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा।
इससे स्पष्ट है कि व्यवस्था की नींव कमजोर है और इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है।

किसानों का सवाल—क्या यही है सम्मान?

किसानों का कहना है कि सरकार हर मंच पर किसान हित की बात करती है, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल उलट है। धान खरीदी केंद्र में ऐसी अव्यवस्था किसानों के सम्मान को ठेस पहुंचाती है।

केंद्र बदइंतज़ामी का प्रतीक बन चुका

धान खरीदी केंद्र अब खरीदी स्थल कम और बदइंतज़ामी का गोदाम ज्यादा दिखाई देता है। हर साल समस्याएँ दोहराई जाती हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नजर नहीं आता।
प्रशासन कब जागेगा?
किसान लगातार मांग कर रहे हैं कि:
हमाल उपलब्ध कराए जाएं
बोरी सिलाई मशीन की व्यवस्था हो
धान रखने और फैलाने के लिए पर्याप्त जगह बनाई जाए
पिछले साल के धान का तत्काल उठाव किया जाए

लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से सिर्फ आश्वासन मिले हैं।
किसानों का सवाल बहुत सीधा है—
“क्या किसान ही बोरी ढोएंगे, तौलेंगे, सिलाई करेंगे और इंतजार भी करेंगे? आखिर प्रशासन कब जागेगा?”
मानपुर से जिब्राईल खान की रिपोर्ट

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