News

गोपाष्टमी पर्व पर गौवत्स और गोपालों की पूजा — गौमाता की महिमा और वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश

मोहला। हिंदू धर्म में गोपाष्टमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन गौवत्स (बछड़ों) तथा गोपालों के पूजन का विशेष विधान होता है। भारतीय संस्कृति में गाय को सृष्टि का सबसे पवित्र और पूजनीय जीव माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गाय को “माता” के रूप में सम्मानित किया गया है, क्योंकि उसमें सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है।

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि कामधेनु — जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य गाय थी — उसकी उत्पत्ति देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। यही कारण है कि गाय को अनादिकाल से समृद्धि, स्वास्थ्य और शुभता का प्रतीक माना गया है।

गोपाष्टमी की संध्या पर गौमाता की पूजा करने से व्यक्ति को सुख, समृद्धि, और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से गाय की सेवा और पूजा करता है, उसके जीवन में दरिद्रता और रोग नहीं ठहरते।

गौमाता का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गाय की रीढ़ की हड्डी (spinal cord) में सूर्यकेतु नाड़ी नामक विशेष तंतु पाया जाता है, जिसमें सर्वरोगनाशक और सर्वविषनाशक गुण माने गए हैं। जब यह नाड़ी सूर्य की किरणों के संपर्क में आती है, तो स्वर्ण (सोना) तत्व का निर्माण करती है। यह सूक्ष्म स्वर्ण तत्व गाय के दूध, मूत्र और गोबर में मिल जाता है, जिससे ये तीनों वस्तुएँ औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।

भारतीय परंपरा में गाय के पंचगव्य — दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर — का प्रयोग आरोग्य, यज्ञ, औषधि और शुद्धिकरण के लिए प्राचीन काल से किया जाता रहा है।

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भी गाय एक अद्भुत प्राणी है। सामान्यतः सभी जीव-जन्तु ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, किंतु गाय के बारे में यह मान्यता है कि वह ऑक्सीजन लेती और छोड़ती दोनों है। यही कारण है कि गाय के आसपास रहने से वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक मानी जाती है।

शास्त्रों के अनुसार आत्मा की विकास यात्रा में गाय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि पशु योनि से मुक्ति पाकर आत्मा मनुष्य योनि में तभी आती है जब वह गाय योनि से होकर गुजरती है। इस प्रकार, गाय को मोक्ष का द्वार भी कहा गया है।

आज जब समाज में गौमाता की उपेक्षा और लापरवाही बढ़ रही है, तो यह केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय पतन का संकेत है। गाय की सेवा, संरक्षण और सम्मान करना न केवल धर्म है बल्कि राष्ट्र की समृद्धि का आधार भी है।

गोपाष्टमी जैसे पावन पर्व हमें स्मरण कराते हैं कि गौसेवा ही देवसेवा है — और जब तक गौमाता का सम्मान और संरक्षण नहीं होगा, तब तक भारत की वास्तविक उन्नति और सुख-समृद्धि संभव नहीं।

️ “गौ माता केवल पशु नहीं, बल्कि भारत की आत्मा हैं।”

—सौजन्य  योगेन्द्र सिंगने मोहला

Back to top button
error: Content is protected !!